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वह आई सुबह की धुप बनकर...

वह आई सुबह की धुप बनकर,
मेरे अँधेरे से बंद कमरे में रौशनी बनकर
कुछ धुंदली  तस्वीर नजर आने लगी
कुछ रंगों से पहचान होने लगी
कुछ लर्डखर्डाते कदम अब सम्हल रहे थे
कुछ टूटे तार जुर्डने लगे थे
लेकिन वह तो कभी रुकने आई ही नहीं थी।
हम इस सुबह से इतना प्यार कर बैठे थे की
हम उससे नही
हम, हम से रुठ बैठे थे ,
कुछ खोने का एहसास था जिसको पाने का आस था
हम अब भी समझ न पाए की सुबह कहा जा चुकी गयी!
खिला हुआ कमरा फिर बंद पर्डने लगा
उस तसवीर ने फिर खुद को छुपा लिया,
मेरा  टुटा दिल तर्डपा नही इस दफा
इसे टुटने की आदत जो थी,
किसी गैर दोपहर, समय एक लफ्ज गुनगुना गया
उसकी आहट कुछ ऐसी गुंजी…

वह सुबह अब शाम हो चुकी थी
वह सुबह अब शाम हो चुकी थी।
Photo credit: Sheempe

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